Saturday, December 25, 2010
बटाईदारी पर भूमि सुधार आयोग की प्रमुख अनुशंसाएं
बटाईदारी पर भूमि सुधार आयोग की प्रमुख अनुशंसाएंबटाईदारों की रक्षा के लिए एक अलग बटाईदारी अधिनियम होना चाहिए.भूमि पर मात्र दो श्रेणियों के व्यक्ति रहें-(क) रैयत, जिसे भूमि पर पूर्ण स्वामित्व, अधिकार तथा हित रहेगा.(ख) बटाईदार, जिसे स्वामित्व का अधिकार नहीं, अपितु भूमि पर लगातार जोत-आबाद का अधिकार रहेगा.क़ानून में सरल भाषा में बटाईदार की स्पष्ट परिभाषा रहे. बटाईदार के पक्ष में एक क़ानूनी मान्यता रहे कि यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य की ज़मीन क़ानूनी तौर पर जोत-आबाद करता हो तो वह व्यक्ति उस अन्य व्यक्ति का बटाईदार माना जाएगा.खंडन का दायित्व उस व्यक्ति का होगा, जो बटाईदार की स्थिति को चुनौती देता हो.हर बटाईदार के पास पर्चा रहे, जिसमें भू-स्वामी का नाम एवं जिस भूखंड पर वह जोत कर रहा है, उसकी संख्या हो. पर्चे की अभिप्रमाणित प्रति भू-स्वामी को दी जाए. बटाईदार का जोत-आबाद का अधिकार अनुवांशिक रहे.सहभागितापूर्ण क्षेत्रीय बुझारत करके स्वत्वाधिकार अभिलेख में बटाईदारों के नाम अभिलिखित होने चाहिए.ऐसा जनोन्मुख सहभागितापूर्ण क्षेत्रीय बुझारत चलाने के लिए नौकरशाही को पुन: उन्मुख और कौशलीकृत किया जाए.इस प्रक्रिया में पंचायतों को पूरी तरह शामिल किया जाए और पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि बटाईदारों के नामों के अभिलेखन की परिशुद्धता सुनिश्चित करें.उत्पादन का न्यायोचित विभाजन हो. यदि बटाईदार उत्पादन व्यय वहन करे तो उसे उत्पादन का 70 से 75 प्रतिशत मिले. यदि भू-धारी उत्पादन व्यय में सहभागी बने तो उत्पादन का 60 प्रतिशत बटाईदार और 40 प्रतिशत भू-धारी को मिले.भू-धारी को मात्र अपनी आजीविका के लिए ज़मीन वापस लेने का अधिकार मिले. तब वह उसे स्वयं जोत-आबाद करेगा. यदि किसी मृत बटाईदार की संतानें बटाईदारी करने से इंकार करें, तब वैसी स्थिति में भू-धारी ज़मीन वापस कर सकता है.भू-धारी वापस हुई भूमि में कोई दूसरा बटाईदार नहीं रख सकेगा. यदि वह ऐसा करता है तो भूमि पुन: मूल बटाईदार को चली जाएगी.व्यक्तिगत खेती को इस प्रकार परिभाषित किया जाए कि भू-धारी उसी गांव या पड़ोसी गांव का निवासी हो और जिस भूमि को वह वापस करना चाहे, उससे उसकी आय के 50 प्रतिशत से अधिक की आय हो.इस नए क़ानून पर चर्चा के दौरान और क़ानून बनने के तुरंत बाद बटाईदारों पर बटाई भूमि सरेंडर करने के लिए दबाव पड़ेगा. जब तक सक्षम राजस्व पदाधिकारी उभय पक्ष को सुनकर निर्णय नहीं दे, तब तक ऐसे सरेंडर को सही नहीं माना जाएगा.बटाईदारी पर्चे की बदौलत व्यवसायिक बैंकों, सहकारिता बैंकों या अन्य वित्तीय संस्थाओं से सांस्थिक ऋृण लिए जा सकेंगे.अंचलाधिकारी को बटाईदार और भू-धारी के बीच विवाद अधिनिर्णय की शक्ति रहेगी. उसके समक्ष अधिवक्ताओं की उपस्थिति पर प्रतिबंध रहना चाहिए. बटाईदार द्वारा वाद दायर करने पर स्टांप ड्यूटी नहीं लगनी चाहिए. प्रथम अपील अनुमंडल पदाधिकारी/भूमि सुधार उप समाहर्त्ता के समक्ष तथा द्वितीय अपील समाहर्त्ता/अपर समाहर्त्ता के समक्ष दायर होनी चाहिए.वर्तमान बिहार काश्तकारी अधिनियम में रैयतों और दर-रैयतों के विभिन्न वर्ग आदि से संबंधित सारे प्रावधान विलोपित होने चाहिए, ताकि पुराने बिहार काश्तकारी अधिनियम तथा नए बटाईदारी अधिनियम के बीच क़ानूनी विरोध न हो.भू-धारी अपनी ज़मीन किसी भी व्यक्ति अथवा संगठन अथवा संस्था को देने के लिए स्वतंत्र होगा, पर इस अंतरण के बावजूद बटाईदार अपने जोत-आबाद के अधिकार का उपयोग करता रहेगा. संपत्ति अंतरण किसी बटाईदार को निष्कासित करने का एक उपकरण नहीं बन सकता.बिना विधि की उचित प्रक्रिया का अनुसरण किए किसी बटाईदार को निष्कासित नहीं किया जा सकेगा. निष्कासन के आधार पर भू-धारी को तीन लगातार फसलों में उत्पादन का हिस्सा जानबूझ कर न देना और/अथवा भूमि के स्वरूप को इस तरह परिवर्तित करना या क्षतिग्रस्त करना हो सकता है, जिसके कारण सामान्य उत्पादकता में हृास आ गया हो.इन अनुशंसाओं को सरकार द्वारा स्वीकार कर लेने के बाद आयोग विधि विभाग को कानूनेत्तर ठोस तथ्यात्मक सामग्री उपलब्ध कराकर बटाईदारी विधेयक का प्रारूप तैयार करने में मदद करने को इच्छुक होगा. निस्संदेह यह आयोग के वर्तमान संदर्भ बिंदुओं से बाहर रहेगा.
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Great page,wish you all the best.Dr.mithilesh verma,M.D.,FACS,California
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